उलटी गंगा ना बहे झुके न आसमान

पारंपरिक
माँ गंगा भजन रानी सती दादी भजन ganga
॥ पावन पाठ ॥

उलटी गंगा ना बहे झुके न आसमान

मेरी मैया कभी न भूले भैया करना भगत का काम

उलटी गंगा ना बहे झुके न आसमान

मैया जी का काम यही है काम भगत का करना जी

इसको चिंता इक यही है भगतो को खुश रखना जी

मेरा बेटा मौज उडाये है इसका यही अरमान

उलटी गंगा ना बहे झुके न आसमान

जिस दिन से मैया की घर में इक तस्वीर लगाई जी

उस दिन से समजो हमने अपनी तकदीर जगाई है,

उस दिन से जुटा रही है मेरी खुशियों का समान

उलटी गंगा ना बहे झुके न आसमान

अगर नही मिलता मैया से ये जीवन बेकार था

लगता था मेरी किस्मत को मैया का इन्तजार था,

मेरे जैसा नही भड भागी मेरी माँ से हुई पहचान

उलटी गंगा ना बहे झुके न आसमान

वनवारी माँ के बारे में इतना ही केहना काफी,

माँ का हाथ रहे सिर पर तो कैसे काम रहे बाकी,

मेरी कारे आत्मा दिन भर मेरी मैया का गुणगान

उलटी गंगा ना बहे झुके न आसमान

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।