कभी कभी खुद से बोलो

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

अपनी नज़र में तुम क्या हो? ये मन की तराजू पर तोलो

कभी कभी खुद से बात करो

कभी कभी खुद से बोलो

हरदम तुम बैठे ना रहो -शौहरत की इमारत में

कभी कभी खुद को पेश करो आत्मा की अदालत में

केवल अपनी कीर्ति न देखो- कमियों को भी टटोलो

कभी कभी खुद से बात करो

कभी कभी खुद से बोलो

दुनिया कहती कीर्ति कमा के, तुम हो बड़े सुखी

मगर तुम्हारे आडम्बर से, हम हैं बड़े दु:खी

कभी तो अपने श्रव्य-भवन की बंद खिड़कियाँ खोलो

कभी कभी खुद से बात करो

कभी कभी खुद से बोलो

ओ नभ में उड़ने वालो, जरा धरती पर आओ

अपनी पुरानी सरल-सादगी फिर से अपनाओ

तुम संतो की तपोभूमि पर मत अभिमान में डालो

अपनी नजर में तुम क्या हो? ये मन की तराजू में तोलो

कभी कभी खुद से बात करो

कभी कभी खुद से बोलो

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।