साईं जी तोरे अंगना परदेसी आये

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॥ पावन पाठ ॥

देके धगा होगे अपने पराये,

दुश्मन सी लागे ये सारी फिजाये,

साईं जी तोरे अंगना परदेसी आये,

परदेशी आये इक आस लगाये,

साईं जी तोरे अंगना परदेसी आये,

कोई न देता हम को सहारा कश्ती को अब तो न मिलता किनारा,

जीवन में सब कुछ ये हारा ही हारा

घ्याल हुआ मेरा दिल ये विचारा

जखम ये अपने किसको दिखाए

मरहम जो तुम देदो हम मुस्कुराए,

साईं जी तोरे अंगना परदेसी आये,

भटके हम दर दर ले अश्को को अपने

टूट गए सारे जिन्दगी के सपने

पल पल लुटता देखा खाबो के अपने

जैसे रेगिस्तान लगता है तपने

गम के समन्दर में डूब न जाए

कोई नही ऐसा जो हमको बचाए

साईं जी तोरे अंगना परदेसी आये,

हमने सुना है तू बिगड़ी बनाता यु ही जमाना तो दर पे न आता,

रहमो की वरिश तो तू ही कराता

उजड़े को तू ही तो गुलशन बनाता

दीदार अपना तू क्यों न कराए

देंगे उम्र भर लाखो दुआए

साईं जी तोरे अंगना परदेसी आये,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।