जगत जिसका ये कुल वनाया हुआ है

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॥ पावन पाठ ॥

जगत जिसका ये कुल वनाया हुआ है

वही सब घट मे समाया हुआ है

और दूसरा ना तुमसा जगत मे, तुमसा जगत मे

अपने मे आप ही भुलाया हुआ है

हरी एक से होंगे रंग-बिरंगे ,रंग बिरंगे

यह जलवा होने का दिखाया हुआ है

है ताकतउसी में मुंह खोलने की,मुंह खोलने की

भेद संतो से जो पाया हुआ है

धर्मी दास अपनी उनकी फिक्र में, उनकी फिक्र में

करोड़ों की दौलत लुटाया हुआ है

प्रेषक-नरेन्द्र वैरवा(नरसी भगत)

8905307813

रमेशदास उदासी जी

गंगापुर सिटी।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।