मैं सईयां वाली हां मेरे सिर ते मेरा साईं वे

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॥ पावन पाठ ॥

मैं सईयां वाली हां मेरे सिर ते मेरा साईं वे,

मैं भागा वाली हां मेरे सिर ते मेरा साईं वे,

मैं क्यों कमजोर पवा मेरे सिर ते मेरा साईं वे,

नही मुश्किल विच घब्राउन्दी,

नही सुख विच मैं इत्रौन्दी,

सब कुछ साईं ते छड के मैं अपनी मौज मनाई वे,

मेरे सिर ते मेरा साईं वे,

जद नाल वे साईं सोना कोई जादू चले न टोना

हूँ नज़र नही लग सकदी ताबीज मैं उसदी पाई वे,

मैं सईयां वाली हां मेरे सिर ते मेरा साईं वे

जद साईं सिर ते हॉवे दुःख मिलो दूर खिलोवे,

कम बन जांदे ने आपे तू रोक लगाउन्दी आई वे

मैं सईयां वाली हां मेरे सिर ते मेरा साईं वे

नच नच के हुकम मनावा गा गा के उह्कू रिजावा

भावे कोई कमली आखे मैं बीच अवल्डी लाइ वे,

मैं सईयां वाली हां मेरे सिर ते मेरा साईं वे

मेहरा झोली विच पावे फकरा नु शाह बनावे

कला साहिल नही कहंदा केह्न्दी है कुल खुदाई वे,

मैं सईयां वाली हां मेरे सिर ते मेरा साईं वे

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।