गुरुजी दरस बिन जियरा मोरा तरसे

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

गुरुजी दरस बिन जिया मोरा तरसे,

गुरु जी मेरे नैनन में जल बरसे ,

गुरु जी दरस बिन जियरा मोरा तरसे,

मैं पापन अब उनकी दासी,

कैसे करें प्रभु निज की दासी,

काया कपत है तेरे डर से,, हो

गुरुजी दरस बिन जियरा मोरा तरसे,,,,

पतित उदाहरण नाम तुम्हारा,

दीजे गुरु जी मुझको सहारा,

देखो दया और प्रेम नजर से,,,हो

गुरुजी दरस बिन जियरा मोरा तरसे,,,,

तुम बिन और न पालक मेरा,

ब्रह्मानंद भरोसा तेरा,

(हाय कैसे कटे उमरिया मोरी,आस ही आस में बीती जाए,,,

हमरे नैन दरस बिन तरसे,बालम तुझ बिन कछु ना सुहाय,,,

तेरी प्रीत के कारण हाय,मोसे रूठे अपने पराए,,,

सब जग रूठे तुम ना रूठो, रुठो तो गजब हुए जाए,,,)

तुम बिन और न पालक मेरा,

ब्रह्मानंद भरोसा तेरा,

विनती करत हूं तेरे दर पे,,, हो

गुरुजी दरस बिन जियारा मोरा तरसे,,,

सिंगर भरत कुमार दबथरा

०९७१९१९४९९२

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।