दो पल का रेन बसेरा याहा

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॥ पावन पाठ ॥

दो पल का रेन बसेरा याहा ये जगत मुसाफिर खाना है

अभिमान करे काहे बंदे नही याहा पे सदा ठिकाना है

दो पल का रेन बसेरा याहा ये जगत मुसाफिर खाना है

क्या लाया क्या ले जाएगा

ना साथ तेरे कुछ जाएगा

जैसा तू ने है कर्म किया वैसा ही फल तू पायेगा

ये तन भी तेरी जागीर नही इसे मिटटी में मिल जाना है

दो पल का रेन बसेरा याहा ये जगत मुसाफिर खाना है

ये मेहल दुमेहले धन दोलत सब यही धरी रह जायेगी

जब हंसा उड़ जाए पिंजरे से कुछ काम न तेरे आएगी

रेह जाएगा खाली पिंजरा ये इक दिन पंसी उड़ जाना है

दो पल का रेन बसेरा याहा ये जगत मुसाफिर खाना है

इस सुंदर मानव चोले का मुरख बंदे अभिमान न कर,

नादान तू उस भगवान से डर,

सुमिरन तू प्रभु के नाम का कर यही काम तुम्हारे आना है

दो पल का रेन बसेरा याहा ये जगत मुसाफिर खाना है

जग में तो सभी मुसाफिर है कुछ समय बिताने आये है

झूठी मोह माया में सारे प्राणी ही याहा बर्माये है

धीरान समज न पाए है जग में या हुआ दीवाना है

दो पल का रेन बसेरा याहा ये जगत मुसाफिर खाना है

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।