कहाँ तुम चले गए

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॥ पावन पाठ ॥

मेरे पिता मेरे भगवान. मेरी दुनियां कर वीरान

कहाँ तुम चले गए ॥

मेरे जीवन की पहचान, मेरी दुनियां कर वीरान

कहाँ तुम चले गए ॥

मेरे पिता मेरे..

मैंने भाव समर्पण का, गुण आपसे सीखा है

सिखलाया आपने ही, जीने का सलीका है

अभी और सिखाना था, ऐसे तो न जाना था,

कहाँ तुम चले गए, मेरे पिता मेरे भगवान.

मेरी दुनियां कर वीरान

कहाँ तुम चले गए ॥

क्यों आपके होने का, अहसास अभी भी है

आओगे लौट के तुम, विश्वास अभी भी है

मेरी दुनियां के सरताज, आ जायो लौट के आज

कहाँ तुम चले गए,मेरे पिता मेरे भगवान.

मेरी दुनियां कर वीरान

कहाँ तुम चले गए ॥

ये आपके ही कर्म थे, जो कुछ बन पाया हूँ

मैं जैसा जो भी हूँ, बस आपकी छाया हूँ

मुझे इसका है अभिमान, मुझे मिला आपका नाम

कहाँ तुम चले गए,मेरे पिता मेरे भगवान.

मेरी दुनियां कर वीरान

कहाँ तुम चले गए ॥

रजनी कुछ चाह नहीं. बस इतना श्याम मिले

जब भी लूँ जन्म कहीं. मुझे आपका नाम मिले

सोनू करता फरियाद. बस छोड़के अपनी याद

कहाँ तुम चले गए,मेरे पिता मेरे भगवान.

मेरी दुनियां कर वीरान

कहाँ तुम चले गए ॥

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।