सुन्दर कहलाते जो इस जग के नज़ारे हैं

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॥ पावन पाठ ॥

सुन्दर कहलाते जो इस जग के नज़ारे हैं

तेरी चुनरी में हे माँ वो चाँद सितारे हैं

सुन्दर कहलाते जो ..........

पूरब में सूरज की लाली जब छाती है

लगता चुनरी ओढ़े तू धरती पे आती है

तेरी ही आभा के ये सारे उजारे हैं

सुन्दर कहलाते जो ..........

चमकीले ये मानिया फीकी पद जाती हैं

भाव से भरी चुनरी में जब सज जाती हैं

तारों के लटकन से झड़े इसके किनारे हैं

सुन्दर कहलाते जो ..........

जब मन तेरे दर्शन को मैया ललचाता है

चुनरी के रंग में ही चंदा रंग जाता है

आजा ओढ़न को माँ आकाश पुकारे है

सुन्दर कहलाते जो ..........

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।