पीर नु मनों चली आ

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

आओ नी आओ सखियों हथा ते मेहंदी लाओ

मैं पीर नी मनोन्न चली आ..........

जीने चलना है देर ना लाओ

मैं पीर नु मनोन्न चली आ.......

मेरा पीर मुरादा वाला,

सब्दिया झोलिया भरदा,

मेरा पीर मुरादा वाला,

भर भर झोलिया वंडे ,

कोई रोटियां कोई वोटिया कोई मंगे मुंडे ,

मैं वी आंखु मेरी वी जड़ लाओ ,

मैं पीर नू मनोन्न चली आ.........

जे मस्ता ते जाना होवे,

ना ना कदे ना करिए,

सब्तो पहला पांज जुठ दी,

सिर तो तले लाइए ,

अपने अपने पहुंच मुताबिक बिल्कुल भेंट चढ़ाइए ,

जे मालिक तो मांगना होवे मांगते बनके जाइए ,

नीचा तार के मुरादा पाओ के,

मैं पीर नू मनोन्न चली आ .........

पहला में ललित सा लोको, फिर मैं होया निमाना,

जदो पीर दी कृपा होई, फिर मैं होया दीवाना ,

मैं पीर नू मनोंन चलिया.........

जे पीरा ते जाना होवे, नीवे हो के जाईए,

जे पीरा तो मांगना होवे, मंगते बनके जाइए,

मैं पीर नू .......

ललित गेरा (SLG)

SLG Musician Jhajjar

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।