गुण अवगुण दी कसोटी ते न चाडेयो

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॥ पावन पाठ ॥

संगता नु कदे भी न दिल तो बिसारेयो,

गुण अवगुण दी कसोटी ते न चाडेयो,

अपना बना के कदे दुरिया न पायो जी

सीरा उतो रेहमता दा साया न हटायो जी,

दुखिया दे दुखड़े हमेशा ही निवारियो

गुण अवगुण दी कसोटी ते न चाडेयो,

खुशियाँ तू सारी साडी झोली विच पाइया ने

रोनका ही रोनका गुरु जी तुसा लाइया ने

चडी होई गुडी नु कदे भी न उतारेयो,

गुण अवगुण दी कसोटी ते न चाडेयो,

अंग संग साड़े तुसा हर वेले रेह्न्दे ओ

बिन दस्या ही हर हर गल सुन लेनदे हो,

पेहला भी उबारेया ते आगे भो उबारेयो,

गुण अवगुण दी कसोटी ते न चाडेयो,

बड़ी बडिया सदा साडे वल रखियो

साहिल दी भगती नु कदे न परखियो,

प्यार ते दुलार भाजो कुछ न विचारियो

गुण अवगुण दी कसोटी ते न चाडेयो,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।