कर शुकराना गुरु अपने दा रज रज के

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॥ पावन पाठ ॥

कर शुकराना गुरु अपने दा रज रज के,

जीना हम को शिखाते गुरु जी हस हस के

कर शुकराना गुरु अपने दा रज रज के,

दीन दयालु तारण हारा जो सबना दा बने किनारा

हसदी एहदी बड़ी ही उची हर कहे कहे जो सूचि

जय जय कार करी जा इस दी घज घज के

कर शुकराना गुरु अपने दा रज रज के,

खान गुना दी सतगुरु मेरा ज्ञान सूरज तो करे सवेरा

जो भी इसदी शरनी आये मंजिल उसदी पार लगाये

कदम कदम ते रहंदा जो संग हर पल वे

जीना हमको शिखाते गुरु जी हस हस के

गूर वन्दगी एसी नैया गूर ही बाँदा आप खावैयाँ,

लख चोरासी पार लगान्दा कमल आस दे आप खिलादा

सीख गुरा दी ते चल तू राही बिन भटके

जीना हमको शिखाते गुरु जी हस हस के

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।