झुंझनु में घुंघटो ना जाऊ काड के

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॥ पावन पाठ ॥

झुंझनु में घुंघटो ना जाऊ काड के

मेरी दादी ने रिजा सु महे को नाच नाच से

झुंझुन में जावन के ताई अर्जी सो सो वार लगाई,

तब जा कर माहरी दादी जी की झुंझुन से चिठ्ठी है आई

कितनी दूर से मैं आई चाल के

मेरी दादी ने रिजा सु महे को नाच नाच से

घूँघटियों आड़े आ जावे माहने कुछ भी न नजर आवे

दादी से मिलने की ईशा मन ही मन में रह जावे

भजन सुना छु मैं दादी ने भाव से

मेरी दादी ने रिजा सु महे को नाच नाच से

झुंझनु के दरबार के आके म्हारा पग्लेया थिरकन लागे

गैर कदे न नाचू सोनू नाचू बस दादी के आगे

मिले है नाचन को यो मा को भाग से

मेरी दादी ने रिजा सु महे को नाच नाच से

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।