कही डूब जाऊ न

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

कही डूब जाऊ न अब लगा दो तुम किनारा

मजधार में फसी है नैया साईं तू ही सहारा

कही डूब जाऊ न अब लगा दो तुम किनारा

दर दर भटक रहा हु बाबा अब कितना भटकाओ गे

आखिर में मेरे बाबा कब तक मंजिल तक पोह्चाओ गे

हस्ती है मुझपे दुनिया साईं तेरा ही सहारा

कही डूब जाऊ न अब लगा दो तुम किनारा

बिगड़ी पल भर में बनाये जीवन को चमकाता है

बिगड़ी भाग रेखा को साईं पल भर में सजाता है

मेरी बिगड़ी बना दो हां बाबा तुझको है पुकारा

कही डूब जाऊ न अब लगा दो तुम किनारा

मैं बहुत बेबस हु बाबा मैं बहुत लाचार है

दुःख ने एसा तांडव किया है तन मन से बीमार हु

सुनील तिवाड़ी चन्दन तेरे बेटे ने पुकारा

कही डूब जाऊ न अब लगा दो तुम किनारा

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।