नश्वर काया की सेवा में जन्म विरथा हो जावे

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॥ पावन पाठ ॥

नश्वर काया की सेवा में जन्म विरथा हो जावे

तन का नित शिंगार करे पर मन में न रह जावे

जन्म धरत ही शोर मचावे मरत ही सुखत खावे

माटी की ये काया आखिर माटी में मिल जावे

तन पिंजरे से प्राण पखेरू जब बहार उड़ जावे

घर वाली द्वारे तक जावे बेटा अग्नि लगावे

रोने वाले रोते रहते जाने वाला जावे

सुंदर काया भी मरघट पे राख राख हो जावे

नश्वर काया की सेवा में जन्म विरथा हो जावे

जीवन का ये उज्वल दीपक पल पल बूजता जावे

मानव मन के मेहल बनावे तन कुटिया गिर जावे

बचपन हो या होके जवानी मौत रहम न खावे

चेतन दूजी काया धारे पेहली मरघट जावे

नश्वर काया की सेवा में जन्म विरथा हो जावे

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।