हो जीवे पता पते दे नाल टानी

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॥ पावन पाठ ॥

हो जीवे पता पते दे नाल टानी,

ते सागरा नाल पानी वे एहदा तेरी लोड साहिबा,

रहे चल दी स्वासा वाली तानी मैं जपा तेरी वाणी मैं मंगा न कुछ होर मलका,

हो जीवे पता पते दे नाल टानी,

माड़िया तू कमा तो तू बचाई मेरे दातिया,

हर साह न तू चरनी लाइ मेरे दातिया,

हो जींद मेरी मिटी दी ही ता डेरी तू मुखड़ा न फेरी ले चरना न जोड़ दतिया,

हो जीवे पता पते दे नाल टानी,

चन ते चकोर वाला रिश्ता बना दवी,

आवा तेरे कॉल ओहि रस्ते तू पा दवी,

जे मैं भुला तू सीधे रहे भावी न मन भटकावी वे तेरे हाथ डोर साहिबा,

हो जीवे पता पते दे नाल टानी,

साहा च प्रीत दे समावि गुरु प्यारेया,

नस राले वाला तारो जीवे लखा नु है तरेया,

मैं ते तेरी तेरा होना चावा तेरा ही दिता खावा न भूख कोई होर साहिबा,

हो जीवे पता पते दे नाल टानी,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।