रही बक्श्दा तू किते होए कसूर दातिया

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॥ पावन पाठ ॥

रही बक्श्दा तू किते होए कसूर दातिया,

सहनु चरना तो करी न तू दूर दातिया,

असि कपडे नु चढ़े कच्चे रंग वरगे,

असि कच दी बनाई होइ वांग वरगे,

इको झटके च हो जा गे चूर दातिया,

सहनु चरना तो करी न तू दूर दातिया,

इस तन विच जिहने कोने सास वसदे,

हर सास विच लखा ही गुनाह वसदे,

मनो दूर कर मान ते गरूर दातिया,

सहनु चरना तो करी न तू दूर दातिया,

असि पानी उते खींची हो लकीर वरगे,

किसी झाडी विच फसी होइ लीर वर्गी,

हाक सारे यह मंगल हठूर दतिया,

सहनु चरना तो करी न तू दूर दातिया,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।