के बड़ा ही सकूँ सा मिला

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॥ पावन पाठ ॥

दर बदर सा मैं बर्बाद इक परिंदा था,

पंख बेजान थे बस नाम को ही जिन्दा था,

मिली जो छत तेरी तो साईं बनी बात मेरी,

जमीन से आसमा तक बड गई औकात मेरी,

के बड़ा ही सकूँ सा मिला हा जीने का जन्नुन सा मिला,

मिला जो तेरा दर मुझे साईं तो बंद हर रास्ता खुला,

तेरी करुना का मैं एहसान चूका कैसे तेरे कदमो से मैं अपना सिर उठाऊ कैसे,

तूने उमीद से भी ज्यादा मुझको दियां तेरा मैं शुकर मनाऊ तो मनाऊ कैसे,

के बड़ा एहसान है किया किरपा का तूने दान है दिया,

झुका है सिर सजदे में तेरे के मेरा हर काम है किया,

के बड़ा एहसान है किया ....

संत तुम को कहू बाबा या फ़कीर कहू तुम्हे भगवान कहू या अपनी तकदीर कहू,

गुरु हो आप ही मेरे आप माता पिता,

आस छोटी सी है दू जिन्दगी चरनो में बिता,

के बड़ा ही सकूँ सा मिला हा जीने का जन्नुन सा मिला,

मिला जो तेरा दर मुझे साईं तो बंद हर रास्ता खुला,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।