अरदास मैं करा

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

उठ दे बहन्दे अरदास करा सोहन्दे जग दे अरदास करा,

चलदे फिरदे अरदास करा हर कम करदे अरदास करा,

इक मन हो के अरदास करा हसदे रोंदे अरदास करा

औख वेले अरदास करा सोखे वेले अरदास करा

मस्ती विच भी अरदास करा चरनी बह के अरदास करा

दिल दी कह के अरदास करा सोके वेले अरदास करा

हथ जोड़ के अरदास मैं करा

दुखिया दे लई अरदास करा सुखिया दे लई अरदास करा

गैरा दे लई अरदास करा मित्रा दे लई अरदास करा

मंदिया दे लई अरदास करा चंगेया दे लई अरदास करा,

हठ जोड़ के अरदास मैं करा

चरनी लाए अरदास करा ना ठुकराई अरदास करा ,

परदे काजी अरदास करा नेड़े राखी अरदास करा

दाता तुहियो अरदास करा राखा तुहियो अरदास करा

हथ जोड़ के अरदास मैं करा

सेवक बन के अरदास करा निष्ये कर के अरदास करा,

तेरा होके अरदास करा तुझ विच खोके अरदास करा

मैं मैं छड़ के अरदास करा झोली अड़ के अरदास करा

हथ जोड़के अरदास मैं करा

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।