मेरा पौणाहारी उड़ दा है विच पौना दे

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॥ पावन पाठ ॥

मेरा पौणाहारी उड़ दा है विच पौना दे,

जेहड़ा साह दिंदा है साहनु साह दे साह बन के,

मोरा ते ता बेठन दा इक बहाना है

ओह ता उड़ जांदा है हवा विच हवा बन के,

मेरा पौणाहारी उड़ दा है विच पौना दे,

साहा बकछन वाले दा पौना विच वासा है

किने लेने है ओहदे हथ खाता ए,

सुन सागर पूछ के देख उस कीड़े तो पथरा विच बैठा जेहड़ा गवाह बन के,

मेरा पौणाहारी उड़ दा है विच पौना दे,

इक इक सह बड़मुला मूड दा लख करोड़ी न,

की करने ये धुर अंदर तक सुरति जोड़ी न,

जद मूक जानी मणि सागर तो जे स्वासा दी मिटी न मिटी होना अंत सवा बन के,

मेरा पौणाहारी उड़ दा है विच पौना दे,

तू क्यों ढाह मस्जिद मैं क्यों ढाना मंदिर नु,

आज रल के पढ़िए इक दूजे दे अंदर नु,

जद पता ओहदे हथ डोर तेरे साहा दी,

तू खुद ही बह गया बंदेया खुदा बन के,

मेरा पौणाहारी उड़ दा है विच पौना दे,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।