रूप रब दा लगदा नहीं

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॥ पावन पाठ ॥

रूप रब दा लगदा नहीं जेहड़ा जोगी पिंड़ विच आया,

तनु चल दिखावा नी ओहनू रतनो ने लाल बनाया ,

ओहदे गल विच सिंगी आ नी नाले बाह विच पाई झोली,

ओहदा मुखड़ा चन वरगा नहीं नाल तकनी भोली भोली,

पैरा विच पउये ने नाले चिमटा हाथ सजाया,

रूप रब दा लगदा नहीं जेहड़ा जोगी पिंड़ विच आया,

ओहदे बोल प्यारे ने हुंडियां जो मिशरी दिया डलियाँ,

जेहड़े राह तो लांग जंदानी नाले फूल खिलदे नाले कलियाँ,

नूर चेहरे उते एहना आ करमा वाली दा जाया

रूप रब दा लगदा नहीं जेहड़ा जोगी पिंड़ विच आया,

नी ओ बोहड़ा थले नी बैठा रेह्न्दा धुना ला के,

तेरी रंगियां जटावा दे नी दुःख टूट दे दर्शन पाके,

मेरे वीरे पिरती ने ओहदे चरनी शीश झुकाया,

रूप रब दा लगदा नहीं जेहड़ा जोगी पिंड़ विच आया,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।