मनमोह लिया मेरा सतगुरु ने

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॥ पावन पाठ ॥

मन मोह लिया मेरा सतगुरु ने किते दिल नु होर लगावा की,

ओह्दी महिमा तक तक जी न भरे किसे होर दी महिमा गावा की,

मन मोह लिया मेरा सतगुरु ने किते दिल नु होर लगावा की,

मेरे सतगुरु दीं दयाल बड़े ओह सुख दे मीह बरसौंदे ने,

सुन के विनती ओह भगता दी सब आके कष्ट मिटाउँदे ने,

इस दर से सब कुछ मिल जांदा किते होर मैं शीश झुकावा की,

मन मोह लिया मेरा सतगुरु ने किते दिल नु होर लगावा की,

मेरे गुरु दी किरपा जद हॉवे बज राज बहारा करदे ने,

कन्डेया नु हटाके राहा तो खैरा नाल झोलिया भर दे ने,

केवल एथे फुला वरसे किते झोली होर फैलावा की,

मन मोह लिया मेरा सतगुरु ने किते दिल नु होर लगावा की,

ऐहदी मेहरा ते चर्चे था था ते हर शेह विच नूर समाया है,

एह्दे वरगा कोई होर नहीं दुखिया नु सीने लाया है

केवल मेरी अखिया विच वसदे मैं दिल तो नाम भुलावा की,

मन मोह लिया मेरा सतगुरु ने किते दिल नु होर लगावा की,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।