अबिनासी दुलहा कब मिलिहो भगतन के रछपाल

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॥ पावन पाठ ॥

अबिनासी दुलहा कब मिलिहो भगतन के रछपाल

जल उपजी जल ही सो नेहा, रटत पियास पियास ,

मैं ठाढ़ी बिरहन मग जोहूँ , प्रियतम तुमरी आस

छोड़े नेह गेह, लगि तुमसों , भयी चरण लवलीन ,

तालामेलि होत घट भीतर , जैसे जल बिन मीन

दिवस नभूख ,रैननहिं निदिया ,घरआँगन न सुहावे ,

सेजरिया बैरन भइ हमको , जाबत रेन बिहावे

हमतो तुमरी दासी सजना, तुम हमरे भरतार ,

दीनदयाल दया करि आवो, समरथ सिरजन हार

कह कबीर सुन जोगिनी, तो तन में मन हि मिलाय.

तुम्हरी प्रीति के कारने, हो बहुरि मिलिहंइ आय

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।