मैं लाडला गुफा वाले दा

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॥ पावन पाठ ॥

जह्नु कहन्दे पौणाहारी है ज़िद्दी मोर दी सवारी है,

मैं लाडला गुफा ओ वाले दा मैं लाडला ओ धुनें वाले दा,

ढोलगिरि दा पर्वत है ज़िद्दी दयोटगुफा विच डेरा है,

जिथे देवी देवता भी आके ओहदे घर दे कॉल वसेरा है,

उस सुनहरी जटा वाले दा सोहनी गुफा वाले दा,

मैं लाडला गुफा ओ वाले दा मैं लाडला ओ धुनें वाले दा,

जदो चेत महीना आंदा है एहदे दर ते मेले लगदे ने ,

आउंदे दुरो दुरो भगत प्यारे आके सजदे करदे ने,

एह जोगी दुखड़े हर दा है सब दिया झोलियाँ भरदा है,

मैं लाडला गुफा ओ वाले दा मैं लाडला ओ धुनें वाले दा,

एहनु पौणाहारी कहन्दे ने जो मोर सवारी करदा है ,

एहनु दूधाधारी कहन्दे ने दूध पूत न झोलियाँ भरदा है,

पिंका भी एहदा पुजारी है मेरी किस्मत एहने सवारी है ,

मैं लाडला गुफा ओ वाले दा मैं लाडला ओ धुनें वाले दा,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।