हर तरफ हर जगह हर कहीं पे है

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॥ पावन पाठ ॥

हर तरफ, हर जगह, हर कही पे है,

हा.. उसी का रूप...

हा उसी का रूप

रौशनी का कोई दरिया तो है,

हा कही पे ज़रूर..

रौशनी का कोई दरिया तो है

हा कही पे ज़रूर

ये आसमान, ये ज़मी, चांद और सूरज

क्या बना सका है कभी कोई भी कुदरत..

कोई तो है जिसके आगे है आदमी मजबूर..

हर तरफ, हर जगह, हर कही पे है

हा.. उसी का रूप

इंसान जब कोई है राह से भटका

इसने दिखा दिया, उसको सही रास्ता..

कोई तो है जो करता है मुश्किल हमारी दूर..

हर तरफ, हर जगह, हर कही पे है

हा.. उसी का रूप

रौशनी का कोई दरिया तो है

हा कही पे जरूर |

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।