न देना चाहे कुबेर का धन

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॥ पावन पाठ ॥

ना देना चाहे कुबेर का धन,

मगर सलीका सहूर देना।

उठा के सर जी सकूँ जहाँ में,

बस इतनी इज़्ज़त जरूर देना ।

ना बैर कोई न कोई नफरत, नज़र न आये कहीं बुराई ।

हर एक दिल में तू दे दिखाई, मेरी नज़र को वो नूर देना ॥

उठा के सर जी सकूँ...

बड़ी ना मांग में चीज़ तुमसे, औकात जितनी है मांगता हूँ ।

जो घाव दुःख ने दिए हैं दिल में, तू उसका मरहम जरूर देना ॥

ना देना चाहे कुबेर का धन...

( जब तक बिक ना था, तो कोई पूछता ना था

तुमने खरीद कर मुझे अनमोल कर दिया )

मैं मांगता हूँ ऐ मेरे कान्हा, वो चीज़ मुझको जरूर देना ।

मिले ज़माने के सारी दौलत, मगर ना मुझको गुरूर देना ॥

उठा के सर जी सकूँ जहां में...

ना देना चाहे कुबेर का धन, मगर सलीका सहूर देना ।

उठा के सर जी सकूँ जहाँ में, बस इतनी इज़्ज़त जरूर देना ॥

Uploaded By - श्री यादव (दिनेश) जबलपुर.

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।