जोगी निक्का जेहा शाहतलाइयाँ विच गुफा दे बैठा

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॥ पावन पाठ ॥

शाहतलाइयाँ विच गुफा दे बैठा कोई जोगी,

जद जोगी नु मैं सी तकिया मैं दीवानी हो गई,

एता निक्का जेहा कौन एह ता सोहना जेहा कौन जोगी निक्का जेहा,

जोगी मेरे दी की है निशानी,

सोहनिया जटावा ते रूप नूरानी,

ओह ता बोहड़ा हेठा रेह्न्दा जोगी निक्का जेहा,

पौणाहारी दा रूप निराला हथ विच चिमटा सिंगियाँ वाला,

ओहता धुना लाके बेहंदा जोगी निका जेहा

जोगी मेरे दी सूरत भोली,

पैरी खड़ावा मुंड झोली,

ओह ता धरुनाझाड़ी बेहंदा जोगी निक्का जेहा,

जोगी मेरे दी कहा मैं कहानी गौआँ चरावे उम्र नयाणी,

ओह ता माँ रत्नो दा लाल जोगी निक्का जेहा

निशा निष् दिन गुण तेरा गावे,

बाबा जी दियां भेटा सुनावे,

ओह ता कॉल गिरी रेह्न्दा जोगी निक्का जेहा

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।