नहीं धन दोलत की चाहत है

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॥ पावन पाठ ॥

नहीं धन दोलत की चाहत है,

है कर्म तेरा ये राहत है,

तूने जितना दिया है खुश है हम चाहिए न खजाना और जागीर,

तू भी फ़कीर मैं भी फ़कीर,

साई इतना दीजिये जा मैं कुटब समाये,

मैं भी भूखा न रहु साधु न भूखा जाए,

दो रोटी की हो नयात बस इतनी सी है साई चाहत बस,

कुछ हो न हो इस जीवन में तेरी बिंदगी हो पीरो की पीर,

तू भी फ़कीर मैं भी फ़कीर,

साई के दरबार से खाली गया न कोई,

जो चौकठ तक आ गए भला सभी का होये,

साई हम से शराफत होती रहे बस तेरी इबादत होती रहे,

नहीं हमसे हो कोई गुस्ताखी रहे पाक सदा अपना जमीन,

तू भी फ़कीर मैं भी फ़कीर,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।