पता कुछ नहीं है कहाँ जा रहा हूँ

पारंपरिक
श्री कृष्ण भजन कृष्ण भजन krishna
॥ पावन पाठ ॥

पता कुछ नहीं है कहाँ जा रहा हूँ

कहाँ जा रहा हूँ

तू ले जा रहा है वहाँ जा रहा हूँ

वहाँ जा रहा हूँ

पता कुछ नही हैं कहां जा रहा हूँ

कहाँ जा रहा हूँ

कृष्ण की प्रेम बाँसुरिया सुन भई वो प्रेम दिवानी

जब-जब कान्हा मुरली बजाएँ दौड़ी आये राधा रानी,

पता कुछ नही हैं कहां जा रहा हूँ

कहाँ जा रहा हूँ

तू अंधे की लाठी पता बेपता का

मैं फल पा रहा हूँ अपनी खता का

कहाँ से कहाँ ठोकरें खा रहा हूँ

ठोकरें खा रहा हूँ

पता कुछ नही हैं कहां जा रहा हूँ

कहाँ जा रहा हूँ

कदम जो तेरे आशियाने में रखा

मजा खूब मैं तेरी उल्फत का चखा

फ़ना हो रहा फिर भी रंग ला रहा हूँ

फिर भी रंग ला रहा हूँ

पता कुछ नही हैं कहां जा रहा हूँ

कहाँ जा रहा हूँ

तुम्हारे लिए मैंने छोड़ा ज़माना

मगर तुम भी करने लगे हो बहाना

मैं तिनके की जैसे बहा जा रहा हूँ

बहा जा रहा हूँ

पता कुछ नही हैं कहां जा रहा हूँ

कहाँ जा रहा हूँ

सुनो श्याम बहादुर कन्हैया रंगीला

ना पहचान पाया शिव तेरी लीला

सितम दिलरुबा का सहा जा रहा हूँ

सहा जा रहा हूँ

पता कुछ नही हैं कहां जा रहा हूँ

कहाँ जा रहा हूँ

पता कुछ नहीं है कहाँ जा रहा हूँ

कहाँ जा रहा हूँ

तू ले जा रहा है वहाँ जा रहा हूँ

वहाँ जा रहा हूँ

पता कुछ नही हैं कहां जा रहा हूँ

कहाँ जा रहा हूँ।।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।