गुरु चरना दे उत्ते मत्था जदो टेकेया

अलका गोएल
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॥ पावन पाठ ॥

गुरु चरना दे उत्ते मत्था जदो टेकेया

नूरी आखिया ने जदो मेरे वल वेखिया,

अन्द्रो तन मन ठरेया नी, मैनु नशा प्रेम दा चड़िया नी

गुरु दे प्रेम विच हो गयी हो गयी नूरो नूर जी,

जेहड़े पासे वेखा ओथे हाज़र हजूर जी ।

मैं सिर चरना दे विच राखिया नी,

मैनू नशा प्रेम दा चड़ेया नी...

गुरु मेरे ने कित्ता ए कमाल जी,

शहंशाह बनाया मेनू युग्गा तो कंगाल सी ।

नी मैं राज राज दर्शन करेया नी,

मैनू नशा प्रेम दा चड़ेया नी...

गुरु प्यारे मेरे दिल विच्च वसदे,

दिल लुट लेनदे जदों हौले हौले हसदे ।

ऐसा जादू करिया नी,

मैनू नशा प्रेम दा चड़ेया नी...

जदों दा मैं पा लिया है पीर पीर जी

जन्मा तो सुत्ती जागी मेरी तकदीर नी

मन ओहदे ही रंग विच रंगेया नी,

मैनू नशा प्रेम दा चड़ेया नी...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।