पौणाहारी बन के दुधाधारी बन के

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

पौणाहारी बन के, दुधाधारी बन के,

चले आना, बाबा जी चले आना ll

बाबा मोर पे सवार हो के आना ll

चिमटा साथ ले के, झोली हाथ ले के,

चले आना, बाबा जी चले आना,

पौणाहारी बन के,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बाबा बाल रूप में आना ll

पैरीं पऊए पा के, सिंगी गले सजा के,

चले आना, बाबा जी चले आना,

पौणाहारी बन के,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बाबा शाहतलाई में आना ll

गऊएँ साथ ले के, चिमटा हाथ ले के,

चले आना, बाबा जी चले आना,

पौणाहारी बन के,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बाबा शिव के रूप में आना ll

डंमरू साथ ले के, त्रिशूल हाथ ले के,

चले आना, बाबा जी चले आना,

पौणाहारी बन के,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

माता रत्नो के साथ में आना ll

भरथरी साथ ले के, चोला हाथ ले के,

चले आना, बाबा जी चले आना,

पौणाहारी बन के,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।