शक्तिपीठों की गाथा

पारंपरिक
महादेव भजन दुर्गा भजन shiv
॥ पावन पाठ ॥

तुने रूप अनेकों धारे, उंचे पर्वतवालिये

लगे एक से एक न्यारे, सुनले लाटा वालिये

आत्मदाह शिव सुना सती का भये क्रोध मे आंधे

झुलसा हुआ शरीर सती का लटकाया निज कांधे

फिरते पर्वत मारे- मारे ऊंचे पर्वत वालिये......

हाहाकार मचा त्रिलोकी, लगे देव थर्राने

सृष्टि रक्षा हेतु विष्णु ने धनुष बाण संधाने

सती के अंग काट भूडारे ऊंचे पर्वत वालिये

केश गिरे जाकर कलकत्ते, बनी कालिका काली

नीलांचल आसाम गिरी कुख, भयी कामाख्या वाली

तेरे होवे जय जयकारे ऊंचे पर्वत वालिये

शीश गिरा पर्वत शिवलोका शाकुम्भरी बन आई

हाथ गिरे ढिंग जाय कराची हिंगलाज कहलाई

सुरनर- मुनिजन उचारे ऊंचे पर्वत वालिये

मस्तिष्क गिरा पास चंडीगढ़ मनसा देवी नाम पडा़

नंगल पर्वत नैन गिरे वहाँ नैना देवी नाम चला

ढेडे- मेढे राह तुम्हारे ऊंचे पर्वत वालिये

चरण गिरे गियरे भरवाई चिंतपुरणी आई

ज्वाला जी पर्वत जिह्वा गिरी वहाँ ज्वाला माँ कहलाई

दिखे लपटों के नजारे ऊंचे पर्वत वालिये

नगरकोट मे स्तन गिरे वहाँ वज्रेश्वरी बन आई

त्रिकुट मणिक पर्वत पर बाजू गिरे वैष्णो देवी कहाई

श्रीधर तेरा नाम पुकारे ऊंचे पर्वत वालिये......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।