अब बढ़ो बढ़ो मेरे सुभाष

अज्ञात
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॥ पावन पाठ ॥

बर्मा के विप्लव से सहसा शासन का आसन डोल उठा..

उस बूढ़े शाह बहादुर का बूढ़ा मजार तब बोल उठा..

अब बढ़ो-बढ़ो ,हे मेरे सुभाष !

तुम हो मजबूर नहीं साथी..

अब देख रहा है लाल-किला ..

दिल्ली है दूर नहीं साथी !

बोले नेताजी ,तुम्हे कभी हे शाह नहीं भूलेंगे हम..

चारों बेटों का खून और वह आह नहीं भूलेंगे हम..

तुम और तुम्हारी कुर्बानी,युग-युग तक होगी याद हमें..

कोई भी मूल्य चूका करके बस होना है आजाद हमें !

प्रण करता हूँ मैं ,तेरा मजार मैं,आजाद हिन्द लेकर जाऊं..

अन्यथा हिन्द के बहार ही मैं..

घुट-घुट करके मर जाऊं !

घुट-घुट करके मर जाऊं !

स्वर : माधुरी मिश्रा

रचनाकार : अज्ञात

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।