मेरे साहिबा मैं तेरी हो मुक्की हाँ

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॥ पावन पाठ ॥

मेरे साहिबा मैं तेरी हो मुक्की हाँ,

मैनु मेरे साहिबा, मनो ना वसारी,

हर गल्लों मैं टुकिया,

मेरे साहिबा मैं तेरी हो मुक्की हाँ ।

अवगुन हारी को गुण नाही,

वक्ष करे ता मैं छुटियाँ ,

मेरे साहिबा मैं तेरी हो मुक्की हाँ ।

ज्यों पावे त्यों राख पियारिया,

दामन तेरे वे मैं लुक्कियां,

मेरे साहिबा मैं तेरी हो मुक्की हाँ ।

जे तू नजर मेहर दी भाले,

चढ़ चौबारे मैं सुत्ती हां,

मेरे साहिबा मैं तेरी हो मुक्की हाँ ।

कहे हुसैन फ़कीर साईं दा,

दर तेरे दी मैं कुत्ती हां,

मेरे साहिबा मैं तेरी हो मुक्की हाँ ।

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।