एक डाल दो पंछी बैठा कौन गुरु कौन चेला

कुमार विशु
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॥ पावन पाठ ॥

एक डाल दो पंछी बैठा,कौन गुरु कौन चेला,

गुरु की करनी गुरु भरेगा,चेला की करनी चेला रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

माटी चुन-चुन महल बनाया,लोग कहे घर मेरा,

ना घर तेरा,ना घर मेरा,चिड़िया रैन-बसेरा रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

कौड़ी कौड़ी माया जोड़ी,जोड़ भरेला थैला,

कहत कबीर सुनो भाई साधो,संग चले ना ढेला रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

मात कहे ये पुत्र हमारा,बहन कहे ये वीरा,

भाई कहे ये भुजा हमारी,नारी कहे नर मेरा रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

देह पकड़ के माता रोये,बांह पकड़ के भाई,

लपट-झपट के तिरिया रोये,हंस अकेला जाई रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

जब तक जीवे,माता रोये,बहन रोये दस मासा,

बारह दिन तक तिरिये रोये,फेर करे घर वासा रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

चार गज़ी चादर मंगवाई,चढ़ा काठ की घोड़ी,

चारों कोने आग लगाई,फूँक दियो जस होरी रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

हाड़ जले हो जैसे लाकड़ी,केश जले जस धागा,

सोना जैसी काया जल गयी,कोई ना आया पैसा रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

घर की तिरिया ढूंढन लागि,ढूंढ फिरि चहुँ देसा,

कहत कबीर सुनो भाई साधो,छोड़ो जग की आशा रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

पान-पान में बाँध लगाया,बाद लगाया केला,

कच्चे पक्के की मर्म ना जाने,तोड़ा फूल कंदेला रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

ना कोई आता,ना कोई जाता,झूठा जगत का नाता,

ना काहू की बहन भांजी,ना काहू की माता रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

डोढी तक तेरी तिरिया जाए,खोली तक तेरी माता,

मरघट तक सब जाए बाराती,हंस अकेला जाता रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

इक तई ओढ़े,दो तई ओढ़े,ओढ़े मल-मल धागा,

शाला-दुशाला कितनी ओढ़े,अंत सांस मिल जासा रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

कौड़ी-कौड़ी माया जोड़ी,जोड़े लाख-पचासा,

कहत कबीर सुनो भाई साधो,संग चले ना मासा रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

कौड़ी-कौड़ी माया जोड़ी,जोड़ जोड़ भाई ढेला,

नंगा आया है,पंगा जाएगा,संग ना जाए ढेला रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

माटी से आया रे मानव,फिर माटी मिलेला,

किस-किस साबन तन को धोया,मन को कर दिया मैला रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

माटी का एक नाग बना कर पूजे लोग-लुगाया,

जिन्दा नाग जब घर में निकले,ले लाठी धमकाया रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

जिन्दे बाप को कोई ना पूजे,मरे बाप पुजवाया,

मुट्ठी भर चावल लेकर के कौवे को बाप बनाया रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

बेचारे इंसान ओ देखो,अजब हुआ रे हाल,

जीवन भर नंग रहा रे भाई,मरे उढ़ाई शाल रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

इस मायानगरी में रिश्ता है तेरा और मेरा,

मतलब के संगी और साथी,इन सब ने है घेरा रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

प्रेम-प्यार से बनते रिश्ते,अपने होय पराये,

अपने सगे तुम उनको जानो,काम वक़्त पे आये रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

ये संसार कागज़ की पुड़िया,बूँद पड़े गल जाना,

ये संसार कांटो की बाड़ी,उलझ-उलझ मर जाना रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

जीवन धारा बह रही है,बहरों का है रेला,

बूँद पड़े तनवा गल जाए,जो माटी का ढेला रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

मात-पिता मिल जाएंगे लाख चौरासी माहे,

बिन सेवा और बंदिगी फिर मिलान की नाहे र साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

जिसको दुनिया सब कहे,वो है दर्शन-मेला,

इक दिन ऐसा आये,छूटे सब ही झमेला रे साधुभाई,

उड़ जा हंस अकेला |

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।