बिरमित्रापुर का मंदिर इक सपना सा लगता है

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॥ पावन पाठ ॥

बिरमित्रापुर का मंदिर इक सपना सा लगता है,

मंदिर का कोना कोना अपना सा लगता है,

बिरमित्रापुर का मंदिर इक सपना सा लगता है,

मंदिर का हर कण कण है हीरे मोती से बढ़ कर,

है पूजने के लायक मंदिर का हर पत्थर,

हर कण कण में दादी का यहाँ प्यार झलकता है,

मंदिर का कोना कोना अपना सा लगता है,

बिरमित्रापुर का मंदिर इक सपना सा लगता है,

हम तो यहा अपनी दादी जी से मिलने आते है,

कुछ दिल की बाते केहने कुछ सुन ने आते है ,

चरणों में बैठ के दादी के सच्चा सुख मिलता है,

मंदिर का कोना कोना अपना सा लगता है,

बिरमित्रापुर का मंदिर इक सपना सा लगता है,

रहती है यहा माहरणी सती ये घर है दादी का,

वैकुण्ठ से भी प्यारा ये मंदिर है दादी का,

सौरव मधुकर ये मैं ही नहीं सारा जग कहता है,

मंदिर का कोना कोना अपना सा लगता है,

बिरमित्रापुर का मंदिर इक सपना सा लगता है,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।