ताकत वतन की हमसे है हिम्मत वतन की हमसे है

गोपालदास सक्सेना "नीरज"
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॥ पावन पाठ ॥

ताकत वतन की हमसे है

हिम्मत वतन की हमसे है

इज्ज़त वतन की हमसे है

इंसान के हम रखवाले

पहरेदार हिमालय के हम, झोंके हैं तूफ़ान के

सुनकर गरज हमारी सीने फट जाते चट्टान के

ताकत वतन की हमसे है...

सीना है फौलाद का अपना, फूलों जैसा दिल है

तन में विन्ध्याजल का बल है, मन में ताजमहल है

ताक़त वतन की हमसे है...

देकर अपना खून सींचते देश की हम फुलवारी

बंसी से बन्दूक बनाते हम वो प्रेम पुजारी

ताकत वतन की हमसे है...

आकर हमको कसम दे गई, राखी किसी बहन की

देंगे अपना शीश, न देंगे मिट्टी मगर वतन की

ताक़त वतन की हमसे है...

खतरे में हो देश अरे तब लड़ना सिर्फ धरम है

मरना है क्या चीज़ आदमी लेता नया जनम है

ताकत वतन की हमसे है...

एक जान है, एक प्राण है सारा देश हमारा

नदियाँ चल कर थकी रुकी पर कभी न गंगा धरा

ताक़त वतन की हमसे है...

गीतकार - गोपालदास सक्सेना "नीरज"

संगीत - ऐस.डी.बर्मन

फिल्म - प्रेम पुजारी (1970)

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।