लागा चुनरी में दाग छुपाऊं कैसे

साहिर लुधियानवी
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॥ पावन पाठ ॥

लागा चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे

चुनरी में दाग, छुपाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे

लागा चुनरी में दाग...

हो गई मैली मोरी चुनरिया

कोरे बदन सी कोरी चुनरिया

जाके बाबुल से नज़रें मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे

लागा चुनरी में दाग...

भूल गई सब बचन बिदा के

खो गई मैं ससुराल में आके

जाके बाबुल से नज़रे मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे

लागा चुनरी में दाग...

कोरी चुनरिया आत्मा मोरी

मैल है माया जाल

वो दुनिया मोरे बाबुल का घर

ये दुनिया ससुराल

जाके बाबुल से नज़रे मिलाऊँ कैसे, घर जाऊँ कैसे

लागा चुनरी में दाग...

गीतकार - साहिर लुधियानवी

संगीत - रौशन

गायक - मन्ना डे

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।