असि रुल्दे फिरदे आ साइयां बांह फड़ लै

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॥ पावन पाठ ॥

असि रुल्दे फिरदे आ साइयां बांह फड़ लै,

असि अकला तो फिर गये आ साइयां बांह फड़ लै,

जिस दिन मेरी वाह पकड़े गा उस दिन मानुगा मैं,

साई साई क्यों कहे जमाना तब ये जानुगा मैं,

साहनु देके सबर सबुरी सादे दुःख हर ले,

तेरी चरनी गिर गये आ साइयां बांह फड़ लै,

असि रुल्दे फिरदे आ साइयां बांह फड़ लै,

हे जोगी तेरा रूप निराला शिरडी रेन वसेरा,

सब दे घर जान वाले क्यों सुना घर मेरा,

असि तेरे होंगे आ तू भी हां कर ले,

रस्ते तो फिसल गये आ साइयां बांह फड़ लै,

असि रुल्दे फिरदे आ साइयां बांह फड़ लै,

नूर जॉली जब शिरडी आया तूने गले लगाया,

कामा कहे हर ख़ुशी वो पाए जो साई का हो आया,

रमा भी धुप च सड़ गये आ साइयां छा कर लै,

संगत विच मिल गये आ साइयां बांह फड़ लै,

असि रुल्दे फिरदे आ साइयां बांह फड़ लै,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।