कैकेयी का अनुताप | लौट चलो तुम घर को

पारंपरिक
श्री राम भजन राम भजन ram
॥ पावन पाठ ॥

"यह सच है तो अब लौट चलो तुम घर को |"

चौंके सब सुनकर अटल कैकेयी स्वर को |

सबने रानी की ओर अचानक देखा,

बैधव्य-तुषारावृता यथा विधु-लेखा |

बैठी थी अचल तथापि असंख्यतरंगा ,

वह सिंही अब थी हहा ! गौमुखी गंगा ---

"हाँ, जनकर भी मैंने न भारत को जाना ,

सब सुन लें,तुमने स्वयं अभी यह माना |

यह सच है तो फिर लौट चलो घर भईया ,

अपराधिन मैं हूँ तात , तुम्हारी मईया |

दुर्बलता का ही चिन्ह विशेष शपथ है ,

पर ,अबलाजन के लिए कौन सा पथ है ?

यदि मैं उकसाई गयी भरत से होऊं ,

तो पति समान स्वयं पुत्र भी खोऊँ |

ठहरो , मत रोको मुझे,कहूं सो सुन लो ,

पाओ यदि उसमे सार उसे सब चुन लो,

करके पहाड़ सा पाप मौन रह जाऊं ?

राई भर भी अनुताप न करने पाऊँ ?

थी सनक्षत्र शशि-निशा ओस टपकाती ,

रोती थी नीरव सभा ह्रदय थपकाती |

उल्का सी रानी दिशा दीप्त करती थी ,

सबमें भय,विस्मय और खेद भरती थी |

'क्या कर सकती थी मरी मंथरा दासी ,

मेरा ही मन रह सका न निज विश्वासी |

जल पंजर-गत अरे अधीर , अभागे ,

वे ज्वलित भाव थे स्वयं तुझी में जागे |

पर था केवल क्या ज्वलित भाव ही मन में ?

क्या शेष बचा था कुछ न और इस जन में ?

कुछ मूल्य नहीं वात्सल्य मात्र , क्या तेरा ?

पर आज अन्य सा हुआ वत्स भी मेरा |

थूके , मुझ पर त्रैलोक्य भले ही थूके ,

जो कोई जो कह सके , कहे, क्यों चुके ?

छीने न मातृपद किन्तु भरत का मुझसे ,

हे राम , दुहाई करूँ और क्या तुझसे ?

कहते आते थे यही अभी नरदेही ,

'माता न कुमाता , पुत्र कुपुत्र भले ही |'

अब कहे सभी यह हाय ! विरुद्ध विधाता ,---

'है पुत्र पुत्र ही , रहे कुमाता माता |'

बस मैंने इसका बाह्य-मात्र ही देखा ,

दृढ ह्रदय न देखा , मृदुल गात्र ही देखा |

परमार्थ न देखा , पूर्ण स्वार्थ ही साधा ,

इस कारण ही तो हाय आज यह बाधा !

युग युग तक चलती रहे कठोर कहानी ---

'रघुकुल में भी थी एक अभागिन रानी |'

निज जन्म जन्म में सुने जीव यह मेरा ---

'धिक्कार ! उसे था महा स्वार्थ ने घेरा |'---''

"सौ बार धन्य वह एक लाल की माई |''

जिस जननी ने है जना भरत सा भाई |"

पागल-सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई ---

"सौ बार धन्य वह एक लाल की माई |''

रचयिता - मैथिली शरण गुप्त

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।