हे गुरुदेव दया के सागर विनती मेरी सुन लेना

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

(तर्ज : क्या मिलीये ऐसे लोगों से)

हे गुरुदेव दया के सागर विनती मेरी सुन लेना,

जीवन नैया डगमग डोले, उसको पार लगा देना,

तेरी महिमा सबसे निराली, तुम करूणा के सागर हो,

जो भी शरण में आये तेरी, भरते उसकी गागर हो,

जितना भरोसा करके आया, उतनी कृपा कर देना,

जीवन नैया.....

जो भी तेरे दर पे आया, खाली नही लौटाया है,

ऐसा क्या कसुर है मेरा, दिल से मुझे भुलाया है,

भुल हुई है जो भी मेरी, उसको दिल से भुला देना,

जीवन नैया........

भटक रहा हुँ इधर उधर मैं, बात उडीकुँ डगर-डगर,

ज्ञान की ऐसी ज्योत जगादो, कृपा तेरी हो जाय अगर,

सारे भक्त तेरी राह निहारे एक बार दरश दिखा देना,

जीवन नैया.......

सौरभ सोनी

सरिया, गिरिडीह

झारखंड

८२५३२०

संपर्क - 8210062078

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।