ये गर्व भरा मस्तक मेरा प्रभु चरण धूल तक झुकने दे

हरी ॐ शरण
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॥ पावन पाठ ॥

ये गर्व भरा मस्तक मेरा प्रभु चरण धूल तक झुकने दे,

अहंकार विकार भरे मन को, निज नज़्म की माला जपने दे,

ये गर्व भरा मस्तक मेरा..

मैं मन के मैल को धो ना सका,ये जीवन तेरा हो ना सका,

हाँ..हो ना सका,मैं प्रेमी हूँ, इतना ना झुका,

गिर भी जो पड़ूँ तो उठने दे,

ये गर्व भरा मस्तक मेरा..

मैं ज्ञान की बातों में खोया और कर्महीन पढ़कर सोया,

जब आँख खुली तो मन रोया, जग सोये मुझको जगने दे,

ये गर्व भरा मस्तक मेरा..

जैसा हूँ मैं खोटा या खरा,निर्दोष शरण में आ तो गया,

हाँ..आ तो गया,इक बार ये कह दे खाली जा,

या प्रीत की रीत झलकने दे,

ये गर्व भरा मस्तक मेरा..

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।