छूटे कभी ना ये ढाढण तेरा

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

जब तक हो दादी जीवन मेरा,

छूटे कभी ना ये ढाढण तेरा,

तेरी सेवा में रहे अर्पण तन मन मेरा,

जब तक हो दादी जीवन मेरा,

इतनी किरपा करना हर दम इस लायक रहु मैं,

जब दिल चाहे मेरा तेरे ढांढन धाम में औ मैं,

जी भर के करू मैं दर्शन तेरा,

छूटे कभी ना ये ढाढण तेरा,

जब तक हो दादी जीवन मेरा,

अमावस की अमावस को तेरी घर में ज्योत जलाऊ मैं,

और पुरे परिवार के संग में तेरी दोहक लगाउ मैं

भर दे तू खुशियों से आँगन मेरा,

छूटे कभी ना ये ढाढण तेरा,

जब तक हो दादी जीवन मेरा,

अपने सुख दुःख सारे केवल तुझको ही बताऊ मैं ,

तीज त्यौहार सभी मेरे तेरे साथ मनाऊ मैं,

छोडू कभी न दामन तेरा,

छूटे कभी ना ये ढाढण तेरा

तेरी सेवा में ही मेरी सारी उम्र कट जाये,

भूल न जाओ तुमको ऐसा पल जीवन में न आये,

सोनू वो पल हो अंतिम मेरा,

छूटे कभी ना ये ढाढण तेरा

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।