दादी से केह दे तेरी मन रे प्रीत

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॥ पावन पाठ ॥

रोवे क्यों भगत तू हॉवे क्यों अधीर,

दादी से केह दे तेरी मन रे प्रीत ,

दुःख देने वाली दुनिया दुःख के मिटा सी,

तेरा आँसू पोहचन ताई कौन है जो आई सी ,

तेरा सबा प्यारा गा सी तेरे से ही दूर,

दादी से केह दे तेरी मन रे प्रीत ,

माँ बेटा की जग में प्रीत है साँची,

दुःख में है दादी तेरो साथ निभा सी,

या ही बदल सी तेरी हाथ की लकीर,

दादी से केह दे तेरी मन रे प्रीत ,

तेरी हर सुख और दुःख की इन्हे तो खबर है,

अपने भगत के रहे सोनू या निजर है,

बात ये देखि तेरी तू ही करे देर,

दादी से केह दे तेरी मन रे प्रीत ,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।