झुंझनू की मिटटी नसीब हो न हो

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॥ पावन पाठ ॥

अखारी समय में हम करीब हो न हो,

झुंझनू की मिटटी नसीब हो न हो,

जब तक मावड़ी ये सास रहेगी,

थोड़ी सी मिटी मेरे पास रहेगी,

क्या पता झुंझुनू नजदीक हो न हो,

झुंझनू की मिटटी नसीब हो न हो,

अर्थी पे मेरी नहीं फूल चाहिये,

दादी तेरे चरणों की धूल चाहिये,

नाम मेरा भटको में शरीक हो न हो,

झुंझनू की मिटटी नसीब हो न हो,

लाखो लाखो भगतो के पाँव पड़े है,

झुंझनू की मिटी के भाग बड़े है,

क्या पता ये वक़्त मेरा ठीक हो न हो,

झुंझनू की मिटटी नसीब हो न हो,

झुंझनू की मिटटी बड़ी है महान,

वनवारी कण कण गूंजे तेरा नाम,

अगले जन्म में ये गरीब हो न हो,

झुंझनू की मिटटी नसीब हो न हो,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।