जी लूँगा मैं

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

जी लूँगा मैं संसार के बिना,

कैसे जीउ गा माँ तेरे प्यार के बिना ,

जी लूँगा मैं संसार के बिना,

होश संभाला जबसे मैं तेरा नाम पुकारूँ

रोज़ सुब्हा उठकर पहले तेरी तस्वीर निहारूं,

रहु कैसे तेरे दीदार के बिना,

जी लूँगा मैं संसार के बिना,

भोला हूँ पर इतना भी नादन नहीं हूँ मियां

मुझे पता है बिन पानी के चलती मेरी नाइयाँ,

नैया चले न खेवन हार के बिना

जी लूंगा मैं संसार की बिना ..

गिरने से पहले मेरे हाथों को तुमने थमा

इज़्ज़त की नज़रों से सोनू देखे मुझको ज़माना

होता ना ये तेरे उपकार के बिना

जी लूंगा मैं संसार की बिना .......

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।