दादी थारो मुखडो चाँद को टुकड़ो

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

दादी थारो मुखडो चाँद को टुकड़ो जाको कोई न जवाब रे,

आंख्या काजल कारो लागे घणो प्यारो थारो रूप लाजवाब रे,

लूँ राई वारा नजर उतारा,

चाँद तारा छोड़ मैं तो थाने ही निहारा,

लूँ राई वारा नजर उतारा,

रात चांदनी यु चम चम चमके माथे वाली बिंदियां,

मनमोहन मुस्कान थारी ले गई मोरी निन्दियाँ,

तन मन वारु तोहे मैं निहारु कोई सुध बुध आज रे,

लूँ राई वारा नजर उतारा,

काना वाली लहरावे जो आया झूमता संवलियो,

नाक नथनी लागे प्यारी रूप घणो मन भावनियो,

बाजू बंध सोवे चुड़लो मन मोहे,जाको कोई न हिसाब रे,

लूँ राई वारा नजर उतारा,

लाल सुरंगी चुनर सारी जगवा पे लहरावे,

संकट काटे भगता का और झट से काम बनावे,

जोगी गुण गावे थाने ही रिजावे थारे हाथा में लाज रे,

लूँ राई वारा नजर उतारा,

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।