तेरे दर पे मुकद्दर आज़माने मैं भी आया हूँ

कुमार विशु
माता दुर्गा भजन दुर्गा भजन durga
॥ पावन पाठ ॥

तेरे दर पे मुकद्दर आज़माने मैं भी आया हूँ

के हाल दिल तुम्हे सुनाने दाती मैं भी आया हूँ

तिलक करती चन्दन से, कभी केसर से कुमकुम से

जिगर के खून से टीका लगाने मैं भी आया हूँ

तेरे दर पे मुकद्दर आज़माने मैं भी आया हूँ...

कोई चूड़ा, कोई चुनरी, कोई चोला करे अर्पण

मेरी पूँजी है बस आंसू, लुटाने मैं भी आया हूँ

तेरे दर पे मुकद्दर आज़माने मैं भी आया हूँ...

नहीं सोना, नहीं चांदी, जो तुमको भेंट कर पाऊं

तेरे चरणों में सर अपना चढ़ाने मैं भी आया हूँ

तेरे दर पे मुकद्दर आज़माने मैं भी आया हूँ...

ना जानु ध्यान जप-तप मैं, ना जानु ज्ञान और भक्ति

तुम्हे श्रद्धा के फूलों से रिझाने मैं भी आया हूँ

तेरे दर पे मुकद्दर आज़माने मैं भी आया हूँ...

दिए जो दर्द गारों ने, मिले जो जखम अपनों से

निशा जख्मो के तुमको माँ दिखने मैं भी आया हूँ

तेरे दर पे मुकद्दर आज़माने मैं भी आया हूँ...

माँ अपने ‘दास’ नादां से यूँ कब तक रूठ पाओगी

यकीं है तेरी रेहमत पर, मनाने मैं भी आया हूँ

तेरे दर पे मुकद्दर आज़माने मैं भी आया हूँ...

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।