मैं सेवक हा सतगुरु तेरा न भूल जाइ गरीब जानके

पारंपरिक
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॥ पावन पाठ ॥

आवाज मारदी कुटियाँ गरीब दी कदी ते फेरा पाओ सतगुर,

बड़ी देर तो प्यासियां ने सदरा आओ जी घर आओ सतगुरु,

आवाज मारदी कुटियाँ गरीब दी कदी ते फेरा पाओ सतगुर,

बैठा पलका दी सहज विशाके विराजो बावा लाल आके,

मैं सेवक हा सतगुरु तेरा न भूल जाइ गरीब जानके

आउंदे जांदे तेरे सेवका दे हाथ मैं सुनेहा सदा भेजदा रहा,

मूड मूड ओहना रहा ते खलोके लाल तनु वेख दा रहा,

किसे रूप च भी आ मेरे सतगुरु ले जावा गा पेहशान के,

मैं सेवक हा सतगुरु तेरा न भूल जाइ गरीब जानके

मेरे कोल ता निर्माण हुँदा मैं तेरे दर आउंदा,

फड़ चरनी तेरे न कदे छड़ दा ते नाल लेके घर जांदा,

जानी जान सब कुछ जान दा तू चुप बंडी बैठा जानके,

मैं सेवक हा सतगुरु तेरा न भूल जाइ गरीब जानके

जदो आव दा दिहाड़ा दाता दूज दा तू आप न सब भुलान्दा,

गल लाके सबना नु प्यार देवे चरना दे नाल लावदा,

सुख देव कहे मैं भी किते देख ला गुरु जी तेरी छा मनके,

मैं सेवक हा सतगुरु तेरा न भूल जाइ गरीब जानके

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।