दुनिया से मैं हारा हूँ

सौरभ मधुकर
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॥ पावन पाठ ॥

दुनिया से मैं हारा हूँ, तक़दीर का मारा हूँ,

जैसा भी हूँ अपना लो, मैं बालक तुम्हारा हूँ ।

पापों की गठरी ले फिरता मारा मारा,

नहीं मिलती है मंजिल,नहीं मिलता किनारा,

नहीं कोई ठिकाना है,मैं तो बेरसहारा हूँ,

जैसा भी हूँ अपना लो,

मैं बालक तुम्हारा हूँ ।

दुनिया से जो माँगा मिलती रुसवाई है,

तेरे दर पे सुनते हैं होती सुनवाई है,

दुःख दूर करो मेरे,मैं भी दुखियारा हूँ,

जैसा भी हूँ अपना लो,

मैं बालक तुम्हारा हूँ ।

कोशिश करते करते नहीं नांव चला पाया,

आखिर में थक करके तेरे द्वार पे हूँ आया,

इस श्याम को तारो प्रभु,तुझे दिल से पुकारा हूँ,

जैसा भी हूँ अपना लो,

मैं बालक तुम्हारा हूँ ।

दुनिया से मैं हारा हूँ,

तक़दीर का मारा हूँ ।

भजन गायक - सौरभ मधुकर

इस पावन रचना का पाठ कब और कैसे करना चाहिए? ▾
प्रातःकाल स्नान करके अथवा संध्याकाल में शांत चित्त होकर स्वच्छ आसन पर बैठकर पाठ करना परम फलदायी माना जाता है।
नित्य पाठ करने से क्या आध्यात्मिक लाभ होता है? ▾
नित्य भक्तिभाव से स्मरण व पाठ करने से मन में शांति, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।